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परंपरा की बेड़ियों में जकड़ी खापें बदलने को तैयार नहीं

31 जुलाई 2017 (चंडीगढ़) :  हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली देहात की खाप पंचायतों पर तीन साल चले सर्वे की रिपोर्ट – कभी देश की आजादी और समाज सुधार में अहम निभाने वाली खाप-पंचायतें आज भी जमाने की रफ्तार के साथ कदमताल करने को तैयार नहीं हैं। नेतृत्व के विवाद में उलझी इन खाप पंचायतों को समाज में मान्यता तो हासिल है, मगर सोशल मीडिया के इस दौर में चारपाई पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच फैसले लेने की उनकी पुरानी प्रवृत्ति नई पीढ़ी स्वीकार नहीं कर रही। इन खाप पंचायतों को जमाने के साथ अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव की सलाह दी गई है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली देहात की खाप पंचायतों पर हुए सर्वे में यह खुलासा हुआ है। चौधरी देवीलाल विवि सिरसा के लोक प्रशासन विभाग के प्रोफेसर राजकुमार सिवाच ने करीब तीन साल की मेहनत के बाद यह सर्वे रिपोर्ट तैयार की है। चारों राज्यों की 52 खाप पंचायतों के 68 प्रतिनिधियों, 70 निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों, 145 युवक-युवतियों, 18 नेताओं, 105 पुलिसकर्मियों, 50 वकील और 39 मीडिया कर्मियों को इस सर्वे में शामिल किया गया। प्रो. राजकुमार ने अपनी रिपोर्ट में 16 खाप पंचायतों की आंतरिक निर्णय पद्धति के बारे में बीरीकी से समझाया। 30 नवंबर 1997 को सिरसा के दड़बाकलां गांव में दो परिवारों की दुश्मनी में मारे 55 लोगों के केस का जिक्र करते हुए मनमुटाव दूर करने में खाप पंचायतों की को समझाया गया। प्रदेश भर में खाप पंचायतों की संख्या हालांकि 300 के आसपास बताई जाती है, मगर रिपोर्ट में 233 प्रभावी खापों का जिक्र है। पानीपत की तीसरी लड़ाई में जब सैनिकों की अधिक जरूरत पड़ी थी, तब सदाशिव राव भाऊ ने हरियाणा में प्रभावी 18 खाप पंचायतों को पत्र लिखकर सहयोग मांगा था। तब सैकड़ों युवक अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हो गए थे।

सर्वे रिपोर्ट में खापों को बदलाव स्वीकार करने की नसीहत : इसमें कोई शक नहीं कि खाप-पंचायतों के प्रयासों से समाज में सुधार हुआ और शिक्षा के रुझान बढ़ा मगर 1970-80 में सामाजिक व आर्थिक दिक्कतों के साथ-साथ रिजर्वेशन ने इन पर सवाल खड़े कर दिए।  खाप पंचायतों में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ रहा है। अधिकतर लोगों ने इन पंचायतों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने का सुझाव दिया।  अब हुक्का बनाम सोशल मीडिया का दौर नहीं है। पहले हुक्के पर बैठ कर फैसले हुआ करते थे, मगर अब सोशल मीडिया का ट्रेंड है। लिहाजा युवाओं की सोच और जरूरत को ध्यान में देना होगा।  खापों व पंचायतों की मनमानी रोकने के लिए उनका पंजीकरण अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे स्वयं-भू खाप पंचायतों पर रोक लग सकेगी।  खाप पंचायतें नेतृत्व के संकट से जूझ रही हैं। जन संस्थाओं के सहयोग से आधार को मजबूत करना होगा।  खाप पंचायतें बदलाव के लिए तैयार रहें। बदलाव सतत प्रक्रिया है। उन्हें अपनी पुरानी मानसिकता में बदलाव करते हुए खुद को नए जमाने की प्रवृत्ति से जोड़ना होगा।

1970 से 80 के बीच बदनाम होने लगी थीं खाप पंचायतें : रोहतक के बरौना गांव में 7 मार्च 1911 और 1 व 2 फरवरी 1923 को गांधरा में दो बड़ी पंचायतें हुई, जिनमें शादियों में कम खर्च, बरातियों की संख्या तय करने, महिलाओं की शिक्षा संबंधी अहम निर्णय हुए। इसके बाद 1970-80 का दशक ऐसा आया, जब पंचायतों के फैसलों पर अंगुली उठने लगी।

August 1, 2017 को प्रकाशित