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खाप व्यवस्था क्या है ?

खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों यथा राजस्थान, हरयाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में अति प्राचीन काल से प्रचलित है. इसके अनुरूप अन्य प्रचलित संस्थाएं हैं पाल, गण, गणसंघ, जनपद अथवा गणतंत्र.

खाप पंचायतों का इतिहास बहुत पुराना है। ये पंचायतें पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, और राजस्थान के तमाम इलाकों में छठवीं-सातवीं शताब्दी ईसवी से प्रभाव में देखी जा सकती हैं. ये समाज के सामाजिक-आर्थिक संगठन का एक रूप थीं. परम्परागत तौर पर एक खाप के तहत एक ही गोत्र के 84 गाँव आते थे। इसके नीचे सात-सात गाँवों के समूह होते थे, जिन्हें थाम्बा (Thamba) कहा जाता था। एक थाम्बा में 12 गाँव होते थे. बाद में, कई ऐसी खापें अस्तित्व में आईं जिनमें 12 या 24 गाँव ही होते थे. फिलहाल, जाटों की कई प्रभावी पंचायतें हैं जैसे कि बालियान खाप, धनकड़ खाप, रमाला चौहान खाप, बत्तीसा खाप, आदि. महेन्द्र सिंह टिकैत स्वयं बालियान खाप के मुखिया थे.

समाज में सामाजिक व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिए मनमर्जी से काम करने वालों अथवा असामाजिक कार्य करने वालों को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता होती है. यदि ऐसा न किया जावे तो स्थापित मान्यताये, विश्वास, परम्पराए और मर्यादाएं ख़त्म हो जावेंगी और जंगल राज स्थापित हो जायेगा. मनु ने समाज पर नियंत्रण के लिए एक व्यवस्था दी. इस व्यवस्था में परिवार के मुखिया को सर्वोच्च न्यायाधीस के रूप में स्वीकार किया गया है. जिसकी सहायता से प्रबुद्ध व्यक्तियों की एक पंचाय टी होती थी. जाट समाज में यह न्याय व्यवस्था आज भी प्रचालन में है. इसी अधर पर बाद में ग्राम पंचायत का जन्म हुआ.

जब अनेक गाँव इकट्ठे होकर पारस्परिक लें-दें का सम्बन्ध बना लेते हैं तथा एक दूसरे के साथ सुख-दुःख में साथ देने लगते हैं तब इन गांवों को मिलकर एक नया समुदाय जन्म लेता है जिसे जाटू भाषा में गवाहंड कहा जाता है. यदि कोई मसला गाँव-समाज से न सुलझे तब स्थानीय चौधरी अथवा प्रबुद्ध व्यक्ति गवाहंड को इकठ्ठा कर उनके सामने उस मसले को रखा जाता है. प्रचलित भाषा में इसे गवाहंड पंचायत कहा जाता है. गवाहंड पंचायत में सभी सम्बंधित लोगों से पूछ ताछ कर गहन विचार विमर्श के पश्चात समस्या का हल सुनाया जाता है जिसे सर्वसम्मति से मान लिया जाता है.

जब कोई समस्या जन्म लेती है तो सर्व प्रथम सम्बंधित परिवार ही सुलझाने का प्रयास करता है. यदि परिवार के मुखिया का फैसला नहीं माना जाता है तो इस समस्या को समुदाय और ग्राम समाज की पंचायत में लाया जाता है. दोषी व्यक्ति द्वारा पंचायत फैसला नहीं माने जाने पर ग्राम पंचायत उसका हुक्का-पानी बंद करने, गाँव समाज निकाला करने, लेन-देन पर रोक आदि का हुक्म करती है. यदि समस्या गोत्र से जुडी हो तो गोत्र पंचायत होती है जिसके माध्यम से दोषी को घेरा जाता है.

सामाजिक न्याय व्यवस्था दोषी को एक नया जीवन देने का प्रयास करती है. लम्बे अनुभव के आधार पर हमारे पूर्वजों ने इस सामाजिक न्याय व्यवस्था को जन्म दिया है जिसके अनेक स्तर हैं. जब गोत्र और गवाहंड की पंचायतें भी किसी समस्या का निदान नहीं कर पाती तो एक बड़े क्षेत्र के लोगों को इकठ्ठा करने का प्रयास किया जाता है जिसमें अनेक गवाहंडी क्षेत्र, अनेक गोत्रीय क्षेत्र और करीब-करीब सभी हिन्दू जातियों के संगठन शामिल होते हैं. इस विस्तृत क्षेत्र को खाप का नाम दिय जाता है. कहीं-कहीं इसे पाल के नाम से भी जाना जाता है. गवाहंडी का क्षेत्र 5-7 की.मी. तक अथवा पड़ौस के कुछ गिने चुने गावों तक ही सीमित होता है. जबकि पाल या खाप का क्षेत्र असीमित होता है. हर खाप के गाँव निश्चित होते हैं, जैसे बड़वासनी बारह के 12 गाँव, कराला सत्रह के 17 गाँव, चौहान खाप के ५ गाँव, तोमर खाप के 84 गाँव, दहिया चालीसा के 40 गाँव, पालम खाप के 365 गाँव, मीतरोल खाप के 24 गाँव आदि.

खाप शब्द का विश्लेषण करें तो हम देखते हैं कि खाप दो शब्दों से मिलकर बना है . ये शब्द हैं ‘ख’ और ‘आप’. ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह स्वच्छ, निर्मल और सब के लिए उपलब्ध अर्थात न्यायकारी हो. अब खाप एक ऐसा संगठन माना जाता है जिसमें कुछ गाँव शामिल हों, कई गोत्र के लोग शामिल हों या एक ही गोत्र के लोग शामिल हों. इनका एक ही क्षेत्र में होना जरुरी नहीं है. एक खाप के गाँव दूर-दूर भी हो सकते हैं. बड़ी खापों से निकल कर कई छोटी खापों ने भी जन्म लिया है. खाप के गाँव एक खाप से दूसरी खाप में जाने को स्वतंत्र होते हैं. इसी कारण समय के साथ खाप का स्वरुप बदलता रहा है. आज जाटों की करीब 3500 खाप अस्तित्व में हैं.

 

August 1, 2017 को प्रकाशित