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इज़्ज़त’ के नाम पर क्यों हो रही हैं हत्याएँ

बीबीसी से साभार – लगभग दस दिन पहले हरियाणा के कैथल ज़िले के सिंहवाल गाँव में पुलिस की मौजूदगी में वेदपाल नाम के युवक को कत्ल करके उसके शव को चौराहे पर फेंक दिया गया. वेदपाल हाई कोर्ट के आदेश पर मिली पुलिस सुरक्षा के साथ अपनी पत्नी सोनिया को लेने उसके गाँव गया था. ये कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं था. भारत की जनवादी महिला समिति की हरियाणा शाखा का कहना है कि 100 ज़्यादा लड़के लड़कियों को जाति , गाँव , परिवार या समाज के सम्मान या इज़्ज़त के नाम पर क़त्ल कर दिया जाता है. इससे पहले एक ग़ैर-सरकारी संगठन के सर्वेक्षण – इंडियन पॉपुलेशन सर्वे मे कहा गया कि भारत मे एक साल मे कम से कम 650 लड़के लड़कियों को सम्मान के नाम पर मार दिया जाता है और इनमें से 90 प्रतिशत से ज़्यादा मामले हरियाणा , पंजाब और पश्चिमी उतर प्रदेश के होती हैं. 

जो लड़के-लड़की खाप का नियम तोड़ते हैं, उन्हें मौत के घाट उतार देना बिल्कुल ग़लत नही है. जो नियम उनके पूर्वजों ने बनाए हैं, उन्हें तोड़ने की अनुमति किसी को नही दी जा सकती. हरियाणा मे देश का नही, खाप का क़ानून चलता है और ये चलता रहेगा – कादियान खाप के छतर सिंह

बीबीसी ने इस मुद्दे पर एक विस्तृत जाँच कर इन मामलों की जड़ तक पहुँचने का प्रयास किया है. हमारे दिमाग़ मे तीन सवाल थे – क्या सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याएँ वास्तव मे इतने बड़े पैमाने पर होती हैं ? दूसरा यह कि वो मनोस्थिति क्या होती है जिसके वश में आकर मां-बाप या अन्य परिजन अपने ही बच्चों को क़त्ल करने को तैयार हो जाते हैं ? तीसरा यह कि खाप पंचायतें इन इलाक़ों मे लोगों की निजी ज़िदंगी को कैसे नियंत्रित करती हैं ? हमनें देहात का विस्तृत दौरा किया, अनेक पीड़ित परिवारों से बातचीत की और खाप पंचायतों के सदस्यों से पूछताछ भी की… हम अपनी जाँच पूरी कर लौट ही रहे थे कि ख़बर आई कि हरियाणा के हांसी में अपने ‘मन की साथी चुनने की भूल करने वाले’ एक और जोड़े को मौत की नींद सुला दिया गया है.

भय-आतंक ने पीछा न छोड़ा

सबसे पहले हमारी मुलाक़ात हुई दिल्ली के सुल्तानपुर डबास गाँव में रविद्र और शिल्पा से…ये दोनों 24 घंटे पुलिस की सुरक्षा में रहते हैं. वे कहते हैं कि भय और आतंक ने उनका पीछा नहीं छोड़ा है. कुछ दिन पहले रविंद्र ने ज़हर खाकर अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने की कोशिश की थी. रविन्द्र का पुश्तैनी गांव हरियाणा के झज्जर ज़िले का ढराणा है जिसमें कादियान गोत्र के लोग बहुमत में हैं. रविंद्र की पत्नी शिल्पा का गोत्र भी कादियान है. इस बात से कादियान खाप पंचायत बेहद नाराज़ है और उसका आदेश है कि रविन्द्र और शिल्पा को रिश्ता तोड़ना होगा. यदि वे एसा नही करते तो रविंद्र के खानदान को ढराणा गांव छोड़ना होगा. पंचायत का फ़ैसला मान कर रविंद्र का परिवार गांव छोड़कर चला गया था. लेकिन चंडीगढ़ स्थित पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रविंद्र का परिवार भारी पुलिस सुरक्षा के बीच गांव लौट आया. रविंद्र की दादी चंदर देवी कहती हैं – ‘जाएँ तो कहाँ, सदियों से तो परिवार यहीं रहा है’ जब हम ढराणा गांव पहुंचे तो हमारी सबसे पहली मुलाक़ात खाप पंचायत के सदस्यों से ही हुई. कादियान खाप के लोगों ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद गांव के बाहर डेरा डाला हुआ है और ये घोषणा की गई है कि वे रिसालसिंह यानि रविंद्र के दादा के पूरे ख़ानदान को गांव से निकाल कर ही दम लेगें. हुक्का गुड़गुड़ाते हुए 80 वर्षीय छतरसिंह नंबरदार ने कहा, “जो लड़के-लड़की खाप का नियम तोड़ते हैं, उन्हें मौत के घाट उतार देना बिल्कुल ग़लत नही है. जो नियम उनके पूर्वजों ने बनाए हैं, उन्हें तोड़ने की अनुमति किसी को नही दी जा सकती. हरियाणा मे देश का नही, खाप का क़ानून चलता है और ये चलता रहेगा.” उनके साथ बैठे एक और बुज़ुर्ग ने भी हामी भरते हुए इस बात को सही ठहराया. उनका कहना था, “ये बात सही है की समय बदल रहा है और समय के साथ समाज भी बदल रहा है, पर जहाँ तक खाप पंचायतों के बनाए नियमों का सवाल है, जब तक हमारा बस चलेगा, उन्हे बरक़रार रखा जाएगा.”

खाप पंचायत के मुखिया राजसिंह कादियान कहते हैं, “देश का क़ानून अपनी जगह है और समाज का क़ानून अपनी जगह. जो भी खाप का क़ानून तोड़ता है उसे दण्ड दिया जाएगा.”

‘पुलिस कब तक जान बचाएगी ?’

इन पंचायतों का किस कदर असर है इस बात का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है की गांव मे जब हम पहुंचे तो कोई हमे रिसालसिंह यानी रविंद्र के दादा के घर का रास्ता बताने को तैयार नही था. कारण यह है कि खाप का आदेश है कि अगर कोई घर का रास्ता बताता है तो उसे 21 हज़ार रुपए का दण्ड दिया जाएगा. ढराणा गांव पुलिस छावनी बना हुआ है पर उसके बावजूद रिसालसिंह के परिवार में किसी की इतनी हिम्मत नही है की वो घर के बाहर कदम रख सके. खाप के नेता मुस्कुराते हुए कहते हैं कि ‘पुलिस कब तक इस परिवार की जान बचाएगी.’ यहीं इस बात का भी अंदाज़ा हो जाता है की खाप पंचायतों और पुलिस प्रशासन का इस तरह के मामलों मे कैसा घालमेल रहता है. खाप पंचायत ढराणा गांव के बाहर जमा होकर हाईकोर्ट के आदेश से बेपरवाह…जैसे अपना मौक़ा तलाश रही है………और पुलिस मूक है. रविन्द्र के पिता रोहतास सिंह कहते हैं, “जब सरकार और पुलिस खाप पंचायतों के सामने बेबस हैं, तो फिर एक साधारण आदमी उसका सामना कैसे करेगा?.” 

पिछले दस दिनों मे सात लड़के-लड़कियों की सम्मान के नाम पर हत्या की गई है. अगर लड़का-लड़की दोनों की हत्या होती है तो मामला आमतौर पर सामने आ जाता है. लेकिन यदि केवल लड़की की हत्या का मामला हो तो किसी को भनक तक नही लगती – जगमति सांगवान, सामाजिक कार्यकर्ता

समस्या कितनी व्यापक है ?

सम्मान के नाम पर कितनी हत्याएँ हो रही हैं और ये समस्या कितनी व्यापक है? इसका जवाब खोजने के लिए हम मिले जगमति सांगवान से जो जनवादी महिला समिति की अध्यक्षा हैं. जगमति सांगवान ने हमे पिछले दस दिनों के आंकड़े बताते हुए अख़बारों की सुर्खियाँ दिखाईं. उनके अनुसार, “पिछले दस दिनों मे सात लड़के-लड़कियों की सम्मान के नाम पर हत्या की गई है. अगर लड़का-लड़की दोनों की हत्या होती है तो मामला आमतौर पर सामने आ जाता है. लेकिन यदि केवल लड़की की हत्या का मामला हो तो किसी को भनक तक नही लगती..”.

उनके इस दावे की पुष्टि के लिए हमने झज्जर, रोहतक, जींद, कैथल, नरवाना, कलायत 20 स्थानीय पत्रकारों से बातचीत की और इनमें से एक दो को छोड़कर किसी ने भी जगमती की बात को ग़लत नही बताया.

फिर ये मामले दब कर क्यों रह जाते हैं ?

इसके जवाब मे स्थानीय पत्रकार राजेश रावल कहते हैं, “असल मे लड़कियों की हत्या के मामले में परिवार, गांव और पुलिस सभी की मिलीभगत होती है और कई मामलों में तो पोस्टमार्टम तक नही किया जाता. ऐसे मे पत्रकार के लिए इन मामलों को रिपोर्ट करना बहुत मुश्किल होता है. एसे मामले रिपोर्ट होते भी है तो एक वो स्थानीय अख़बार के शहर के पन्ने से बाहर नही जा पाते.” लेकिन वो क्या मनोस्थिति है जिसमें परिवार के लोग अपनों को मारने पर विविश हो जाते हैं? हरियाणा की तर्कशील सोसाइटी के सुभाष तितरम कहते हैं, “मां-बाप मानसिक तौर पर पहले से अपने बच्चों को मारने के लिए तैयार नही होते हैं, बल्कि उनको मजबूर किया जाता है. उन्हें मजबूर किया जाता है खाप पंचायतों द्वारा….पंचायत इन परिवारों का बहिष्कार कर देती है, नल से पानी नही भरने देती, दुकानों से सामान नही मिलता और किसी सामाजिक गतिविधि में उन्हे शामिल होने की अनुमति नही होती. यहाँ तक की इन परिवारों के रिश्तेदारों पर दबाव बनाया जाता है.” 

असल मे लड़कियों की हत्या के मामले में परिवार, गांव और पुलिस सभी की मिलीभगत होती है और कई मामलों में तो पोस्टमार्टम तक नही किया जाता. ऐसे मे पत्रकार के लिए इन मामलों को रिपोर्ट करना बहुत मुश्किल होता है. एसे मामले रिपोर्ट होते भी है तो एक वो स्थानीय अख़बार के शहर के पन्ने से बाहर नही जा पाते – एक स्थानीय पत्रकार

इन बातों की पुष्टि हुई कैथल के मटौर गांव मे वेदपाल के घर पर… वेदपाल के परिवार के अनुसार उनको वेदपाल और सोनिया की शादी पर कोई आपति नही थी पर पंचायत के दबाव मे आकर उन्होंने वेदपाल को समझा कर सोनिया को उसके घर भेजा. यही दबाव सोनिया के परिवार पर भी बनाया गया. स्थानीय लोगों ने बताया कि वेदपाल को पकड़कर पंचायत के हवाले करने वाले के लिए पंचायत ने इनाम की घोषणा भी की हुई थी. खाप पंचायतों का असर इस क़दर है कि स्थानीय लोग लोगों का कहना है कि सम्मान के नाम पर होने वाली हत्याओं के जो मामले दर्ज भी होते हैं, उनमें किसी की हिम्मत नही होती कि गवाह बनकर अदालत मे चला जाए….और लगभग सभी ऐसे मामले अदालत मे गिर जाते हैं.

August 1, 2017 को प्रकाशित