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खाप पंचायत

पिछले कुछ समय से ‘खाप’ पंचायतें चर्चा में हैं। चर्चा में तो वे पहले भी रही हैं, प्रेमी-युगलों को मौत का फरमान जारी करने के कारण, पर इस बार चर्चा का मुद्दा ज़रा गम्भीर है। इस बार उन्होंने जिस प्रकार से सगोत्र विवाह के खिलाफ अपना तालिबानी झण्डा बुलंद किया है और जिस प्रकार चौटाला से लेकर गडकरी तक अपनी छुद्र राजनीति के कारण उनके सुर में सुर मिला रहे हैं, उससे मामला ज्यादा गम्भीर हो गया है।

खाप पंचायतों का असली चरित्र
खाप पंचायतें दरअसल प्राचीन समाज का वह रूढिवादी हिस्सा है, जो आधुनिक समाज और बदलती हुई विचारधारा से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। इसका साक्षात प्रमाण पंचायतों के वर्तमान स्वरूप में देखा जा सकता है, जिसमें महिलाओं और युवाओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर है। यदि इन पंचायतों की मनोवृत्ति और इनके सामाजिक ढ़ाँचे का अध्ययन किया जाए, तो आंकणे सामने आते हैं, वे काफी चिंताजनक हैं। जैसे कि सम्पूर्ण खाप पंचायतों के एरिया (हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में महिला-पुरूष का लिंग अनुपात सबसे खराब है, जबकि इन इलाकों में कन्या भ्रूण हत्या का औसत राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। इससे साफ जाहिर होता है कि खाप पंचायतों का मूल चरित्र नारी विरोधी है। यही कारण है कि पढ़-लिख कर आत्मनिर्भर होती महिलाएँ और उनकी मनमर्जी से होने वाली शादियाँ हमेशा से इनकी आँख का काँटा रही हैं।

कितना दम है समगोत्री विवाह विरोधी तर्क में?
खाप पंचायतों का कहना है कि किसी गोत्र में जन्मे सभी व्यक्ति एक ही आदि पुरूष की संतानें हैं, इसलिए हिन्दू धर्म में समगोत्री विवाह को वर्जित माना गया है। लेकिन अगर गहराई से देखें, तो खाप पंचायतों के इस दावे में दम नहीं है। इसका प्रमाण 1950 में मुम्बई उच्च न्यायालय दे चुका है। उस दौरान उच्च न्यायालय में श्री हरीलाल कनिया (जोकि बाद में स्वतंत्र भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश भी बने) और श्री गजेंद्रगदकर (जो 1960 में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने) की दो सदस्यीय पीठ ने अपने चर्चित फैसले में कहा था कि सगोत्र हिन्दु विवाह वैध है। अपने फैसले में जजों ने कहा था कि पुराणों, स्मृतियों और सूत्रों में गोत्र सम्बंधी इतने अंतर्विरोध भरे पड़े हैं कि उनसे कोई एक निश्चित निष्कर्ष निकालना असम्भव है। इस सम्बंध में जजों की दो सदस्यीय पीठ ने हिन्दु धर्मशास्त्र के प्रश्चात विद्वान पी0वी0 काणे और भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ मैक्समूलर के साथ मनु और याज्ञवल्क्य के ग्रंथों का भी अध्ययन किया था। इससे स्पष्ट है कि खाप पंचायतों की समान गोत्र में विवाह को अवैध घोषित करने सम्बंधी माँग में जरा भी दम नहीं है।

क्या है विरोध का वैज्ञानिक कारण?
पहले तो खाप पंचायतों ने अपनी माँग के समर्थन में प्राचीन परम्परा की दुहाई देती रही हैं, लेकिन जबसे उनका वादा कमजोर पड़ गया है, अब वे इस सम्बंध में वैज्ञानिक कारणों को गिनाने लगी हैं। उनका कहना है कि एक गोत्र में विवाह करने से कई तरह की आनुवाँशिक बीमारियों की सम्भावना रहती है।

आनुवाँशिक विज्ञान के अनुसार इनब्रीडिंग या एक समूह में शादी करने से हानिकारक जीनों के विकसित होने की सम्भावनाएँ ज्यादा होती है, जिससे आने वाली संतानों में कई प्रकार के रोग पनप सकते हैं। लेकिन अगर इस मत को और व्यापक रूप दिया जाए, तो एक जाति अथवा उपजाति में भी विवाह करने से ऐसी सम्भावनाएँ बनी रहती हैं। इसका कारण यह है कि जिस प्रकार हिन्दू समाज में एक गोत्र के लोग एक पिता के वंशज बताए गये हैं, ठीक उसी प्रकार एक जाति अथवा उपजाति के लोग भी एक आदिपुरूष की संतान माने गये हैं। इस हिसाब से देखा जाए तो अंतर्जातीय विवाह और अंतर्धार्मिक विवाह ज्यादा उचित हैं। लेकिन खाप पंचायतें अतर्जातीय विवाह और अंतर्धार्मिक विवाह की भी घोर विरोधी हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि खाप पंचायतों की इस दलील में ज़रा भी दम नहीं है कि समगोत्री विवाह पर रोक लगाई जाए। उनकी यह माँग पुरातनपंथी मानसिकता की परिचायक है, जो नारीवादी उत्थान और अपने असीमित अधीकारों को मिलने वाली चुनौतियों से परेशान है। इसीलिए वह इस तरह की मध्युगीन मानसिकता का परिचय दे रही है। जाहिर सी बात है कि इस तरह की मानसिकता को जायज ठहराना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।

Abhimanyu Singh Tomar यह खाप पंचायत की खिलाफत करने वाले वह दो अगले जाट है जिन्हें यह नहीं पता की उनकी बहन या बेटी किसके साथ भागेगी | यह नसल की लड़ाई है| खाप System prevailing in Jats only and this is the reason why our “नसल” is best in the world. अंग्रेजो ने जाट रेजिमेंट क्यों बनाई थी क्यों नहीं उन्होने चमार और चूड़ा रेजिमेंट बनाई क्या वजे है जब कारगिल में हर रेजिमेंट फ़ैल हो गयी थी तो फिर जाट रेजिमेंट को बुलाया गया था| और जाटों ने कारगिल पर देश का झंडा फैलाया था| आज यही पूरा देश और मीडिया हमारी जाति के खिलाफ दुश्पर्चार कर रहे है क्यों? यह गोत्र सिस्टम हमारी परंपरा है और इसका एक scientific reason है | हमारी जाट नसल आज भी दुनिया की best Nasal.

खाप पंचायत पहली बार महाराजा हर्षवर्धन के कल में 643 ईस्वी में अस्तित्व में आई। प्राचीन काल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले का व्यक्ति ही इस पंचायत का महामंत्री हुआ करता था। गुलामी के समय में भी सबसे बडी खाप पंचायत मुजफ्फरनगर की ही हुआ करती थी। सर्वखाप का उदय पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा की खाप पंचायतों से मिलकर हुआ है। खाप पंचायतों ने देश में कई बडी पंचायतें की हैं और समाज तथा देश के हित में महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी किए तथा जेवर और पर्दा प्रथा को खत्म किए जाने जैसे सामाजिक हित के निर्णय भी लिए। युध्द के समय में भी खाप पंचायतों ने देशभक्ति की मिसाल कायम की है और प्राचीन काल में युध्द के दौरान राजाओं और बादशाहों की मदद की है। वैसे देखा जाए तो देश में परिवार की इजत के नाम पर कत्ल की पुरानी परम्परा रही है। हरियाणा. पंजाब. राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश इनमें सबसे आगे हैं। आनर किलिंग के यादातर मामलों में लडके. लडकी का एक ही गोत्र.सगोत्र. में विवाह करना एक कारण रहा। अंतरजातीय प्रेम विवाह इस अपराध की दूसरी वजह रही। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक गोत्र में विवाह से विकृत संतान के जन्म लेने की आशंका रहती है लेकिन इससे पंचायतों को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वह अपने फरमान से प्रेमी युगल को इतना विवश कर दें कि वह आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए या समाज उन्हें इजत के नाम पर मौत के घाट उतार दे। संवेदनशील सामाजिक मुद्दा होने के कारण सरकार इन मामलों में हस्तक्षेप करने से कतराती रही है। लेकिन अब खाप पंचायतें भी इस संदर्भ में कानून की जरूरत महसूस कर रही हैं । इसीलिए वे राजनीतिक दलों पर दबाव बनाकर सरकार से गुजारिश कर रही हैं कि वह इस संदर्भ में कानून में बदलाव लाए। हालांकि कानून के साथ जरूरत इस बात की भी है कि समाज अपनी मानसिकता में बदलाव लाए और आनर किलिंग के लिए जिम्मेदार कारणों में एक भ्रूण हत्या जैसे अपराधों पर रोक लगायी जाए. जिनकी वजह से इन क्षेत्रों में लिंग अनुपात कम होता जा रहा है।

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