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खाप पंचायत – जाट जाति की सर्वोच्च पंचायत व्यवस्था

खाप या सर्वखाप एक सामाजिक प्रशासन की पद्धति है जो भारत के उत्तर पश्चिमी प्रदेशों यथा राजस्थान, हरियाणा, पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में अति प्राचीन काल से प्रचलित है। इसके अनुरूप अन्य प्रचलित संस्थाएं हैं पाल, गण, गणसंघ, सभा, समिति, जनपद अथवा गणतंत्र।

समाज में सामाजिक व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिए मनमर्जी से काम करने वालों अथवा असामाजिक कार्य करने वालों को नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता होती है, यदि ऐसा न किया जावे तो स्थापित मान्यताये, विश्वास, परम्पराए और मर्यादाएं ख़त्म हो जावेंगी और जंगल राज स्थापित हो जायेगा। मनु ने समाज पर नियंत्रण के लिए एक व्यवस्था दी। इस व्यवस्था में परिवार के मुखिया को सर्वोच्च न्यायाधीश के रूप में स्वीकार किया गया है। जिसकी सहायता से प्रबुद्ध व्यक्तियों की एक पंचायत होती थी। जाट समाज में यह न्याय व्यवस्था आज भी प्रचलन में है। इसी अधार पर बाद में ग्राम पंचायत का जन्म हुआ.

जब अनेक गाँव इकट्ठे होकर पारस्परिक लेन-देन का सम्बन्ध बना लेते हैं तथा एक दूसरे के साथ सुख-दुःख में साथ देने लगते हैं तब इन गांवों को मिलकर एक नया समुदाय जन्म लेता है जिसे जाटू भाषा में गवाहंड कहा जाता है। यदि कोई मसला गाँव-समाज से न सुलझे तब स्थानीय चौधरी अथवा प्रबुद्ध व्यक्ति गवाहंड को इकठ्ठा कर उनके सामने उस मसले को रखा जाता है। प्रचलित भाषा में इसे गवाहंड पंचायत कहा जाता है। गवाहंड पंचायत में सभी सम्बंधित लोगों से पूछ ताछ कर गहन विचार विमर्श के पश्चात समस्या का हल सुनाया जाता है जिसे सर्वसम्मति से मान लिया जाता है।

जब कोई समस्या जन्म लेती है तो सर्व प्रथम सम्बंधित परिवार ही सुलझाने का प्रयास करता है। यदि परिवार के मुखिया का फैसला नहीं माना जाता है तो इस समस्या को समुदाय और ग्राम समाज की पंचायत में लाया जाता है। दोषी व्यक्ति द्वारा पंचायत फैसला नहीं माने जाने पर ग्राम पंचायत उसका हुक्का-पानी बंद करने, गाँव समाज निकला करने, लेन-देन पर रोक आदि का हुक्म करती है। यदि समस्या गोत्र से जुडी हो तो गोत्र पंचायत होती है जिसके माध्यम से दोषी को घेरा जाता है।

सामाजिक न्याय व्यवस्था

सामाजिक न्याय व्यवस्था दोषी को एक नया जीवन देने का प्रयास करती है। लम्बे अनुभव के आधार पर हमारे पूर्वजों ने इस सामाजिक न्याय व्यवस्था को जन्म दिया है जिसके अनेक स्तर हैं। जब गोत्र और गवाहंड की पंचायतें भी किसी समस्या का निदान नहीं कर पाती तो एक बड़े क्षेत्र के लोगों को इकठ्ठा करने का प्रयास किया जाता है जिसमें अनेक गवाहंडी क्षेत्र, अनेक गोत्रीय क्षेत्र और करीब-करीब सभी हिन्दू जातियों के संगठन शामिल होते हैं। इस विस्तृत क्षेत्र को खाप का नाम दिय जाता है. कहीं-कहीं इसे पाल के नाम से भी जाना जाता है। गवाहंडी का क्षेत्र ५-७ की.मी. तक अथवा पड़ौस के कुछ गिने चुने गावों तक ही सीमित होता है। जबकि पाल या खाप का क्षेत्र असीमित होता है. हर खाप के गाँव निश्चित होते हैं, जैसे बड़वासनी बारह के १२ गाँव, कराला सत्रह के १७ गाँव, चौहान खाप के ५ गाँव, तोमर खाप के ८४ गाँव, दहिया चालीसा के ४० गाँव, पालम खाप के ३६५ गाँव, मीतरोल खाप के २४ गाँव आदि।

खाप शब्द का विश्लेषण

खाप शब्द का विश्लेषण करें तो हम देखते हैं कि खाप दो शब्दों से मिलकर बना है । ये शब्द हैं ‘ख’ और ‘आप’. ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह स्वच्छ, निर्मल और सब के लिए उपलब्ध अर्थात न्यायकारी हो. अब खाप एक ऐसा संगठन माना जाता है जिसमें कुछ गाँव शामिल हों, कई गोत्र के लोग शामिल हों या एक ही गोत्र के लोग शामिल हों। इनका एक ही क्षेत्र में होना जरुरी नहीं है। एक खाप के गाँव दूर-दूर भी हो सकते हैं. बड़ी खापों से निकल कर कई छोटी खापों ने भी जन्म लिया है. खाप के गाँव एक खाप से दूसरी खाप में जाने को स्वतंत्र होते हैं. इसी कारण समय के साथ खाप का स्वरुप बदलता रहा है। आज जाटों की करीब ३५०० खाप अस्तित्व में हैं.

सर्व पाल खाप

सर्व पाल खाप में २२ गाँव हैं. यह फरीदाबाद, बल्लभगढ़ से लेकर मथुरा जिले के छाता, कोसी तक फैला एक विशाल संगठन है। इसमें करीब १००० गाँव हैं. इस खाप में कोसी की डींडे पाल, बठैन की गठौना पाल, कामर की बेनीवाल पाल, होडल की सौरोत पाल, धत्तीर अल्लिका की मुंडेर पाल, जनौली की तेवतिया पाल, पैगांव की रावत पाल आदि सम्मिलित हैं। यह पाल दहेज़ निवारण में सबसे आगे है।

सर्वखाप

सर्वखाप में वे सभी खाप आती हैं जो अस्तित्व में हैं। समाज, देश और जाति पर महान संकट आने पर विभिन्न खापों के बुद्धिजीवी लोग सर्वखाप पंचायत का आव्हान करते हैं। निःसन्देश पाल और खाप में अंतर करना काफी कठिन है। साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि पाल छोटा संगठन है जबकि खाप में कई छोटी पालें सम्मिलित हो सकती हैं। खाप और पाल पर्याय वाची माने जाएँ तो अधिक तर्कसंगत होगा। एक ही गोत्र का संगठन पाल हो सकता है जबकि खाप में कई गोत्रीय संगठन और कई जातियां शामिल होती हैं। ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ गोत्र और गाँव कई खाप में शामिल होते हैं। जाट संगठन पूर्णतः स्वतंत्र अस्तित्व वाले होते हैं तथा लोगों की इच्छानुरूप इनका आकर घटता-बढ़ता है। चूँकि ये संगठन न्याय प्राप्त करने और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए लोगों को एकजुट करते हैं अतः जहाँ जिस गोत्र , गाँव, पाल को अधिक विश्वास होता है वे वहीँ सम्मिलित हो सकते हैं। सदस्यता ग्रहण करने पर कोई रोक-टोक नहीं है।

उक्त खापों, पालों के अतिरिक्त जाटों के अनेक संगठन और भी हैं जो कम प्रचारित हैं। राजस्थान में डागर, गोदारा, सारण, खुटैल, और पूनिया जाटों के छोटे-बड़े कई संगठन हैं। नागौर तो जाटों का रोम कहलाता है। मध्य प्रदेश में ग्वालियर से लेकर मंदसौर और रतलाम तक जाटों के अनेक संगठन विभिन्न नामों से अस्तित्व में हैं। कहीं कहीं संगठनों के खाप और पाल जैसे नाम न होकर गावों के मिले-जुले संगठन बने हुए हैं जैसे बड़वासनी बारहा, जिसमें लाकड़ा, छिकारा आदि १२ जाट गोत्रीय गाँव शामिल हैं. सोनीपत जिले में बड़वासनी, जाहरी, चिताना आदि इस बारहा के प्रमुख गाँव हैं. कराला सतरहा भी लाकड़ा सेहरावतों का संगठन है. इसमें मुंडका , बक्करवारा प्रमुख हैं. दिल्ली के पूर्व मुख्य मंत्री साहिब सिंह वर्मा मुंडका के मूल निवासी थे। इसी प्रकार मीतरोल पाल में भी अनेक गाँव हैं जिनमें मीतरोल, औरंगाबाद और छज्जुनगर इसके प्रमुख गाँव हैं. जिनमें लाकड़ा गोत्रीय चौहान वंशी जाट रहते हैं। जाटों के प्रसिद्द उद्योगपति चेती लाल वर्मा इसी पाल के गाँव छज्जुनगर की देन हैं। उड़ीसा के गोल कुंडा एरिया में बसे जाटों के अपने संगठन हैं। जहाँ जाटों की पाल या खाप नहीं हैं वहां जाट सभाएँ खड़ी कर रखी हैं.

सर्वखाप पंचायत

सर्वखाप पंचायत जाट जाति की सर्वोच्च पंचायत व्यवस्था है। इसमें सभी ज्ञात पाल, खाप भाग लेती हैं। जब जाति , समाज, राष्ट्र अथवा जातिगत संस्कारों, परम्पराओं का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है अथवा किसी समस्या का समाधान किसी अन्य संगठन द्वारा नहीं होता तब सर्वखाप पंचायत का आयोजन किया जाता है जिसके फैसलों का मानना और दिशा निर्देशानुसार कार्य करना जरुरी होता है। सर्वखाप व्यवस्था उतनी ही पुराणी है जितने की स्वयं जाट जाति। समय-समय पर इसका आकर, कार्यशैली और आयोजन परिस्थितियां तो अवश्य बदलती रही हैं परन्तु इस व्यवस्था को आतताई मुस्लिम, अंग्रेज और लोकतान्त्रिक प्रणाली भी समाप्त नहीं कर सकी।

‘प्राचीन काल के गणराज्यों की सञ्चालन व्यवस्था सर्वखाप पद्धति पर आधारित थी. शिवाजी के आव्हान पर की पंचायती सेना ने राजा दक्ष का सर काट डाला था। महाराजा शिव की राजधानी कनखल (हरिद्वार) में थी. एक बार दक्ष ने यज्ञ किया था जिसमें शिव को छोड़कर सभी राजाओं को बुलाया था। पार्वती बिना बुलाये ही वहां पहुंची. वहां पर शिव का अपमान किया गया. यह अपमान पार्वती से सहन नहीं हुआ और वह हवनकुंड में कूद कर सती हो गई. शिव को जब पता लगा तो बहुत क्रोधित हुए। शिव ने वीरभद्र को बुलाया और कहा कि मेरी गण सेना का नेतृत्व करो और दक्ष का यज्ञ नष्ट कर दो. वीरभद्र शिव के गणों के साथ गए और यज्ञ को नष्ट कर दक्ष का सर काट डाला। सर्व खाप पंचायत और उसके गणों की यह सबसे पुरानी घटना है।

रामायण काल में इतिहासकार जिसे वानर सेना कहते हैं वह सर्वखाप की पंचायत सेना ही थी जिसका नेतृत्व वीर हनुमान ने किया था और जिसका प्रमुख सलाहकार जामवंत नामक वीर था. राम और लक्ष्मन की व्यथा सुनकर हनुमान और सुग्रीव ने सर्व खाप पंचायत बुलाई थी जिसमें लंका पर चढाई करने का फैसला किया गया. उस सर्व खाप में तत्कालीन भील, कोल, किरात, वानर, रीछ, बल, रघुवंशी, सेन, जटायु आदि विभिन्न जातियों और खापों ने भाग लिया था. वानरों की बहुतायत के कारण यह वानर सेना कहलाई. इस पंचायत की अध्यक्षता महाराजा सुग्रीव ने की थी।

महाभारत काल में सर्वखाप पंचायत ने धर्म का साथ दिया था। महाभारत काल में तत्कालीन पंचायतो या गणों के प्रमुख के पद पर महाराज श्रीकृष्ण थे। श्रीकृष्ण ने कई बार पंचायतें की। युद्ध रोकने के लिए सर्व खाप पंचायत की और से संजय को कौरवों के पास भेजा, स्वयं भी पंचायत फैसले के अनुसार केवल ५ गाँव देने हेतु मनाने के लिए हस्तिनापुर कौरवों के पास गए। शकुनी, कर्ण और दुर्योधन ने पंचायत के फैसले को ताक पर रख कर ऐलान किया कि सुई की नोंक के बराबर भी जगह नहीं दी जायेगी। इसी का अंत हुआ महाभारत युद्ध के रूप में. महाभारत के भयंकर परिणाम निकले। सामाजिक सरंचना छिन्न-भिन्न हो गई। राज्य करने के लिए क्षत्रिय नहीं बचे. महाभारत काल में भारत में अराजकता का व्यापक प्रभाव था। यह चर्म सीमा को लाँघ चुका था। उत्तरी भारत में साम्राज्यवादी शासकों ने प्रजा को असह्य विपदा में डाल रखा था। इस स्थिति को देखकर कृष्ण ने अग्रज बलराम की सहायता से कंस को समाप्त कट उग्रसेन को मथुरा का शासक नियुक्त किया। कृष्ण ने साम्राज्यवादी शासकों से संघर्ष करने हेतु एक संघ का निर्माण किया। उस समय यादवों के अनेक कुल थे किंतु सर्व प्रथम उन्होंने अन्धक, भोज और वृष्नी कुलों का ही संघ बनाया. संघ के सदस्य आपस में सम्बन्धी होते थे इसी कारण उस संघ का नाम ‘ज्ञाति-संघ’ रखा गया। यह संघ व्यक्ति प्रधान नहीं था। इसमें शामिल होते ही किसी राजकुल का पूर्व नाम आदि सब समाप्त हो जाते थे। वह केवल ज्ञाति के नाम से ही जाना जाता था। प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन से यह बात साफ हो जाती है कि परिस्थिति और भाषा के बदलते रूप के कारण ‘ज्ञात’ शब्द ने ‘जाट’ शब्द का रूप धारण कर लिया।

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि महाभारत काल में गण का प्रयोग संघ के रूप में किया गया है। बुद्ध के समय भारतवर्ष में ११६ प्रजातंत्र थे. गणों के सम्बन्ध में महाभारत के शांति पर्व के अध्याय १०८ में विस्तार से दिया गया है । इसमें युधिष्ठिर पूछते हैं भीष्म से कि गणों के सम्बन्ध में आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि वे किस तरह वर्धित होते हैं, किस प्रकार शत्रु की भेद-नीति से बचते हैं, शत्रुओं पर किस तरह विजय प्राप्त करते हैं, किस तरह मित्र बनाते हैं, किस तरह गुप्त मंत्रों को छुपाते हैं. इससे यह स्पस्ट होता है कि महाभारत काल के गण और संघ वस्तुतः वर्त्तमान खाप और सर्वखाप के ही रूप थे।

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